Thursday, March 31, 2011

संवेदनशून्य


बीते दिनों की बात है मेरे घर से अगली गली में रहने वाले एक बुज़ुर्ग का इन्तेकाल हो गया। पाँचों वक़्त की नमाज़ के पाबंद और बा-शरे इन्सान थेमैंने तो उन्हें कभी किसी से लड़ते नहीं देखालेकिन थे बड़े दबंगकिसी की गलत बात को मानने वाले और हक बात कहने वालेजब उनके विसाल की खबर सुनी तो यकायक यकीन ही नहीं हुआपता चला की असर और मगरिब के दरमियाँ उनकी रूह कफसे उन्सरी से परवाज़ कर गयीईशा की नमाज़ के बाद मेरे साथ गली के - लोग उनके घर पहुंचे . वहां काफी लोग मौजूद थे. उनके बड़े लड़के के पास खड़े हम उसे तसल्ली दे ही रहे थे कि हमसे कुछ दूरी पर उनके एक रिश्तेदार की मोटर साइकिल आकर रुकीमोबाइल पर ज़ोरदार तरीके से बात करते हुए आये. पीछे से बुर्का पहने एक मोहतरमा उतरींचेहरा खुला हुआ था. मेरी समझ में नहीं आता कि जब चेहरा खोलना ही है तो बुर्का पहनने की ज़रूरत ही क्या हैखैर, मोटर साइकिल से उतरीं और बेहद ही बेहूदा अंदाज़ में मुस्कुराती हुई उनके बेटे को सलाम करती हुई आगे बढ़ गयींफिर घर के दरवाज़े पर पहुँच कर पर्दा हटा कर अन्दर मौजूद औरतों पर एक नज़र डाली, जोकि पूरे घर में दरवाज़े तक भरी हुई थींदो-एक को देखकर जो ज़हरीली ख़ुशी उनके चेहरे पर फैली उसे देखकर तो मैं हैरान रह गयाजैसे उनकी ऑंखें कह रही हों-"अरे! तुम भी मौजूद हो यहाँ, फिर तो मज़ा गयाअब तो खूब बातें होंगी। " ऐसा लगा ही नहीं जैसे किसी मौत के घर में दाखिल हो रही होंयह लग रहा था जैसे किसी प्रोग्राम में तशरीफ़ लायी हैं. इसके बाद मैं वहां से चला तो आया, पर सारे रास्ते यही सोचता रहा कि आज आदमी ही नहीं औरतें भी उतनी ही संवेदन शून्य हो गयी हैं

Wednesday, March 30, 2011

कुछ पढ़ा था

बीते दिनों ट्रेन से कही जाते वक़्त रेलवे स्टेशन से एक पत्रिका खरीदी। उसमे 'नवांकुर' के नाम से पांच लघु कथाएं थी। जिनमे से २ बहुत अच्छी लगी। वह आपके सामने रख रहा हूँ.........

१-- "बनवारी की बिटिया को जॉब मिल गया है । गाँव में ये समाचार सबके मुंह पर है। '२५-३० हज़ार प्रति माह कमाती है' -गाँव की औरतें कहा करती थी। एक अच्छे होटल में उसकी ड्यूटी भी कम टाइम की थी और वेतन भी अच्छा था । ऐसा वेतन कि उसने अपने देहाती माँ-बाप को शहरी बना दिया था। कुछ दिन बाद होटल की लड़कियों को पुलिस रेड में गिरफ्तार किया गया। उनमे बनवारी की बिटिया भी थी। खबर पाकर बनवारी भी थाने पहुंचा और पूछा -"मेरी बिटिया को क्यों गिरफ्तार किया गया?''
थानेदार ने कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें बनवारी के सामने पटकते हुए कहा -''तुम्हारी बिटिया की इस करतूत की वजह से।'' वह चुप रह गया। अब गाँव में सब कहते हैं-''तो ये था इतना ऊंचा जॉब.''


२-- गंगाराम कि फसलें सूखती जा रही थी । उसके साथ सभी किसानों ने ईश्वर से प्रार्थना की -''हे प्रभु! हमारी फसलें सूखती जा रही हैं , बरसात करा दे तो बात बन जाये।'' ईश्वर ने उनकी नहीं सुनी। बरसात नहीं हुई । सभी ने पैसे खर्च करके सिंचाई करवाई । फसलें तैयार हुईं और काट कर खलिहानों में पहुंचाई गयीं। सबका अनाज खलिहानों में ही पड़ा था। अब क्या था बरसात हुई-घनघोर और मूसलाधार।

Monday, March 14, 2011

प्रदूषण


प्रदूषण शब्द बना है। जीवन के लिए हानिकारक असामान्य प्राकृतिक अवस्था या परिस्थिति प्रदूषण कहलाता है। प्रदूषण कई तरह का होता है। उदहारण के लिए जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण। मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन प्रदूषण का मुख्य कारण है। द्रुत गति से आधुनिकीकरण प्रदूषण को बढावा दे रहा हैजब जहरीले पदार्थ, झीलों, झरनों, नदियों, सागरों तथा अन्य जलाशयों में जाते हैं तो या तो घुल जाते हैं या तैरते रहते हैं या नीचे तलहटी में बैठ जाते हैं। इससे पानी प्रदूषित हो जाता है, उसकी गुणता घट जाती है, जलीय पर्यावरण को प्रभावित करती है। प्रदूषक नीचे भूतल में जाकर भी जल को प्रदूषित कर देते हैं।शोर एक अनचाही ध्वनि है। जो ध्वनि कुछ को अच्छी लगती है वही दूसरों को नापसन्द हो सकती है। यह विभिन्न घटकों पर आधारित होती है। प्राकृतिक वातावरण हवा, ज्वालामुखी, समुद्री जानवरों, पक्षियों की स्वीकार युक्त आवाजों से भरा होता है। मनुष्य द्वारा निर्मित ध्वनियों में मषीन, कारें, रेलगाड़ियाँ, हवाई जहाज, पटाखे, विस्फोटक आदि शामिल हैं। जो कि ज्यादा विवादित हैं। दोनों तरह के ध्वनि प्रदूषण, नींद, सुनना, संवाद यहाँ तक शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
प्रदूषण की एक परिभाषा यह भी हो सकती है कि ''पर्यावरण प्रदूषण उस स्थिति को कहते हैं जब मानव द्वारा पर्यावरण में अवांछित तत्वों एवं ऊर्जा का उस सीमा तक संग्रहण हो जो कि पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा आत्मसात किये जा सकें।'' वायु में हानिकारक पदार्थों को छोड़ने से वायु प्रदूषित हो जाती है। यह स्वास्थ्य समस्या पैदा करती है तथा पर्यावरण एवं सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाती है। इससे ओजोन पर्त में बदलाव आया है जिससे मौसम में परिवर्तन हो गया है।

Monday, January 3, 2011

justaju


तेरी जुस्तजू... तेरी जुस्तजू...

तेरे बिन सूनी सूनी है अखियाँ

तेरे बिन लम्हा लम्हा है सदियाँ

सूना सूना जहां लागे रे.....

सावरे सावरे सावरे........

सावरे सावरे सावरे........

तेरी जुस्तजू... तेरी जुस्तजू...

तू मेरी दिल की दुआ है

मेरी हर ख़ुशी में शामिल है

तू रूह में तू है मेरी ज़िन्दगी ।

तेरी यादों का सावन है

प्यासी प्यासी यह धड़कन है

बस तू नज़र आयेरे॥

सय्यारो से रात भर,

करते है हम जुस्तजू तेरी जुस्तजू॥

अरमानों की.. भीड़ में ,

तेरी ही हैं जुस्तजू॥

सूनी सूनी सी हसरत है ,

कैसे तेरी मोहब्बत है

कुछ न मुझे आयेरे..

तेरे बिन सूनी सूनी है अखियाँ

तेरे बिन लम्हा लम्हा है सदियाँ

सूना सूना जहां लागे रे.....

Wednesday, December 29, 2010

एक कहावत


एक ज़मींदार साहब एक वेश्या पर आशिक हो गए। अपनी सारी ज़मीन जायदाद उस पर लुटा दी। अपने बीबी और बच्चों का ख्याल बिलकुल नहीं रखा। जब सब कुछ लुट गया तो कमाने के लिए परदेस चले गए। वहां उन्हें एक पहुंचे हुए मियां मिल गए। एक महीने तक मेहनत करके जब कुछ रुपया कमा लिया तो मियां को रूपये दिए। मियां समझे कि रुपया बीबी बच्चों के लिए भेज रहे हैं। लेकिन नहीं , साहब को उनकी कहाँ सुध? रुपया देकर मियां से बोले कि ये रुपया उस वेश्या को पहुंचा दें । मियां रुपया लेकर वेश्या के पास पहुंचे, वहां जाकर देखा कि वह अपनी रंगीनियों में मशगूल थी। वापस लौट आये । अगले दिन फिर गए और वापस लौट आये। तीसरे दिन फिर पहुंचे। वेश्या ने देखा कि ये आदमी दो दिन से आकर वापस लौट जा रहा है, कुछ कहता भी नहीं , कोई बात ज़रूर है। उसने मियां से वजह पूछी। मियां बोले कि मेरे दो सवालों का जवाब दे। पहले ये बता कि ऐसे कितने लोग हैं जिनसे तू मुहब्बत करती है? उसने कहा "तीन"। नाम गिनाये तो मीरसाहब का नाम नहीं। मियां बोले अब दूसरे सवाल का जवाब दे कि ऐसे कितने लोग हैं जिन्हें तू समझती है कि वह तुझसे प्यार करते हैं ?जवाब आया "तेरह"। नाम गिनाये तो उनमे भी मीर साहब का नाम नहीं। मियां वापस आये और रूपये साहब के बीबी बच्चों को देकर शहर लौट गए। साहब से जाकर बोले-" हजरत, न तीन में न तेरह में, और उसके लिए मरे जा रहे हो। अगर बुढ़ापा सही गुजारना है तो अपने बीबी बच्चों के होकर रहो."

Saturday, December 11, 2010

दोषी कौन?

हमारे शिक्षक जब यह समझने लगेंगे किहम गुरू के आसन पर बैठे हैं और हमें अपने जीवन के द्वारा अपने छात्रों में प्राण फूकनेहैं , अपने ज्ञान द्वारा बालकों का उद्धार करना है उस समय वे सत्य के रूप में स्वाभिमान के अधिकारी बन सकेंगे। तब वे ऐसी वस्तुप्रदान करने के लिए तत्पर हो सकेंगे जो मूल्य देकर नहीं मिलती। तभी वे छात्रों के लिए पूज्य बन सकेंगे।
आज इसके एकदम विपरीत है । आज शिक्षक कीजो छवि उभर कर आती है उसमे शिक्षक आक्रामक और उद्दंड है। छात्रों द्वारा शिक्षकों के साथ दुर्वयवहार की घटनाएँ , शिक्षको द्वारा की जाने वाली हड़ताल और प्रशासकों से किये जाने वाले व्यवहार शिक्षकों के किन नैतिक मूल्यों का बखान करते हैं? शिक्षको के सम्मान में निरंतर गिरावट आ रही है , इसका दोषी कौन ? ये एक प्रश्न है जो मैं आप के सामने रख रहा हूँ। आप के जवाब के इंतज़ार में............

Saturday, July 31, 2010

मैं ऐसा क्यों हूँ


क्यों खुश हो जाता हूँ मैं


तुम्हारी ख़ुशी देख कर


क्यों हो जाता हूँ मैं हताश


तुम्हें उदास देखकर


चहक सा उठता हूँ मैं क्यों


जब मिलने की बारी आती है


पर क्यों मिलने के बाद घंटो


नींद नहीं आती है


आँखें बंद करने से क्यों


याद तुम्हारी आती है


पर जब खुलती हैं तब


फिर क्यों तू सामने आती है


आंसू तेरे टपकते हैं तब


क्यों मैं सिसकता हूँ


ज़रा सी तू हंसती है तब


क्यों मैं निखरता हूँ


जब भी देखता हूँ तुम्हे


बस यही सोचता हूँ


पूछूं तुमसे या दिल में रखूं ये बात


सुन ज़रा बस इतना बता


मैं ऐसा क्यों हूँ!


मैं ऐसा क्यों हूँ!.........


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Saturday, July 17, 2010

पहचान

निदा फाजली




नहीं, यह भी नहीं


यह भी नहीं यह भी नहीं,


वह तो न जाने कौन थे


ये सब के सब तो मेरे जैसे हैं


सभी की धड़कनों में नन्हे नन्हे चांद रोशन हैं


सभी मेरी तरह वक़्त की भट्टी के ईंधन हैं


जिन्होंने मेरी कुटिया में अंधेरी रात में घुस कर


मेरी आंखों के आगे


मेरे बच्चों को जलाया था


वह तो कोई और थे


वह चेहरे तो कहाँ अब ज़ेहन में महफूज़ जज साहब


मगर हाँ पास हो तो सूँघ कर पहचान सकती हूँ


वो उस जंगल से आये थे


जहाँ की औरतो की गोद में

बच्चे नहीं हँसते

Friday, July 16, 2010

दुनिया



निदा फाजली

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया


बच्चों के स्कूल में शायद तुमसे मिली नहीं है दुनिया



चार घरों के एक मोहल्ले के बाहर भी है आबादी


जैसी तुम्हे दिखाई दी है , सब की वही नहीं है दुनिया



घर में ही मत उसे सजाओ, इधर-उधर भी ले के जाओ


यूँ लगता है जैसे तुमसे अब तक खुली नहीं है दुनिया



भाग रही है गेंद के पीछे, जाग रही है चाँद के नीचे


शोर भरे नारों से अब तक घबरायी नहीं है दुनिया !!!

Wednesday, July 14, 2010

ग्रुप स्टडी के फायदे



कॉम्पिटीशन न हो तो लोग ज्यादा ही रिलैक्स हो जाते हैं। अकेले दौड़ने वाला हलके-हलके रेंगता रहता है। कोई साथ दौड़ने वाला हो तो स्पीड बढती है। रिजल्ट अच्छे आते हैं और तेज़ी से आते हैं। अकेले पढने और ग्रुप स्टडी करने में भी यही डिफरेंस है।

एक्जाम में अच्छे नंबर पाने की होड़ भी आज ज़रूरी है। मेरिट हर जगह काम आती है। स्कोरकरने के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी है कि आप को सारे फंडे क्लिअर हों। चार- छेहदोस्त साथ बैठ कर पढ़ें तो एक दूसरे की काफी मदद कर सकते हैं।ग्रुप स्टडी की सबसे बड़ी खासियत यही है। हर कोई हर फील्ड में एक्सपर्ट नहीं होता इसलिए ग्रुप स्टडी में बैठ कर पढना हमेशा फायदेमंद होता है।

कभी-कभी पढाई से ज्यादा बातचीत और बहस होने लगती है। इस खराबी से बचने का तरीका है कि रोज़ कुछ टार्गेट बनाकर पढना शुरू करें। जब तक टापिक पूरा न हो जाये सिटिंग ख़त्म नहीं करना चाहिए। ग्रुप स्टडी में फायदा यह है कि आप कुछ देर रुक कर दोस्तों से बात कर सकते हैं और पहले की तरह फ्रेश हो सकते हैं। इस से रीजनिंग भी बेहतर होती है और सृजनात्मकता भी बढती है। कभी-कभार सीनिअर्स की मदद भी ली जा सकती है। सीनिअर्स अच्छे सलाहकार साबित हो सकते हैं।